सियासी दलों के गुप्त चंदे को सीमित करने की सिफारिश

Hindi Newsचुनाव में कालेधन का इस्तेमाल रोकने के लिए चुनाव आयोग ने सरकार से राजनीतिक दलों को मिलने वाले गुप्त चंदे पर रोक लगाने का अनुरोध किया है।

चुनाव आयोग ने सरकार को सुझाव भेजा है कि राजनीतिक दलों को 2000 रुपए और इससे ज्यादा के अज्ञात चंदे पर पाबंदी के लिए कानून में संशोधन किया जाए। वर्तमान में राजनीतिक दलों को प्राप्त होने वाले अज्ञात चंदे पर कोई संवैधानिक या कानूनी पाबंदी नहीं है तथा चुनाव में पार्टियों को मिलने वाले चंदे पर टैक्स छूट प्राप्त है। इसी की आड़ में देश भर में कई राजनीतिक पार्टियांं बनी हुई जो कि टैक्स छूट का फायदा उठाती है।

1482317602

चुनाव आयोग ने चुनाव में कालेधन का इस्तेमाल रोकने के लिए तीन सुझाव दिए हैं। पहला सुझाव यह है कि राजनीतिक दलों के दो हजार रुपए से ज्यादा गुप्त चंदा लेने पर रोक लगाने का है। अभी यह सीमा 20 हजार रुपए है। दूसरा चुनाव नहीं लड़ने वाले राजनीतिक दलों को आयकर से छूट न दी जाए। सिर्फ लोकसभा या विधानसभा चुनाव में सीटें जीतने वाले दलों को ही यह छूट मिले। तीसरा राजनीतिक दलों को कूपन के जरिए चंदा देने वालों का भी पूरा ब्यौरा रखा जाए। चुनाव आयोग ने तीनों सुझावों को लागू करने के लिए केंद्र से कानून में संशाोधन करने की सिफारिश की है। यहां यह बता दें कि अभी राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को लेकर यह छूट है कि गुप्त चंदे पर कानूनी रोक नहीं है।

अलबता इसको लेकर एक आंशिक शर्त है, वह यह कि 20 हजार रुपए से ज्यादा के चंदे का ब्यौरा देना जरूरी है। इसके अलावा राजनीतिक दलों को संपत्ति, चंदा, केपिटल गेन या दूसरे स्त्रोतों से हुई आमदनी पर कोई टैक्स नहीं है। कूपन या रसीद के जरिए चंदा देने वालों का ब्यौरा रखना जरूरी नहीं है। इस छूट का फायदा उठाने के लिए बड़ी रकम छोटे हिस्से में दिखाकर सभी पार्टियां टैक्स बचत का फायदा उठाती रही है।

अटलजी- अंबेडकर जन्मदिन पर डिजिटल इनामी योजना
मान लो एक लाख रुपए का चंदा मिला है, तो 20-20 हजार रुपए का चंदा 5 लोगों से मिलना दिखाकर टैक्स छूट का फायदा उठाती है, पार्टियां। यही नहीं कर छूट का फायदा उठाने के लिए लोगों ने राजनीतिक दल बना लिए हैं। इस बारे में कुछ दिनों पहले ही चुनाव आयोग ने ध्यान दिलाया कि देश में पंजीकृत करीब 1900 राजनीतिक दलों में से 1400 से ऐसे राजनीतिक दल है, जिन्होंने कभी भी चुनाव नहीं लड़ा। आयोग ने कहा है कि संभवत: ऐसी पार्टियों का मकसद केवल केवल कालाधन को सफेद करना है।

वे राजनीतिक दल के नाम पर आयकर में मिली छूट का लाभ उठा रहे हैं। यही नहीं राजनीतिक दल 10-20 रुपए के कूपन छपवा कर कितनी भी रकम दान में दिखा सकते हैं। जबकि हमारे पड़ोसी भूटान व नेपाल का चुनावी कानून कहता है कि चुनाव कोष में आए हर दान के साथ दानदाता का नाम-पता बताना अनिवार्य है। भले ही उसने रकम कितनी भी दी हो। यही कानूनी व्यवस्था जर्मनी, ब्राजील, इटली, बुल्गेरिया, अमेरिका, जापान, फ्रांस आदि में भी है। वहां चुनाव के बाद चुनाव खर्च का पूरा ब्यौरा चुनाव आयोग को देना अनिवार्य है।

हम अपने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं, लेकिन अब तक चुनाव को स्वच्छ नहीं बना पाए हैं। असोसिएशन फॉर डेमोके्रटिक रिफोर्म (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वाच (एनईडब्ल्यू) के अनुसार हमारे राजनीतिक दलों के फंडा का 75 फीसदी स्त्रोत अज्ञात रहता है। एडीआर की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार राजनीतिक दलों को 75 फीसदी चंदा अज्ञात स्त्रोतों से मिला। पिछले दस साल में सियासी दलों का चंदा 478 फीसदी बढ़ा। सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में 38 दलों ने 253.46 करोड़ रुपए चंदा जुटाया।

2014 में यह आंकड़ा 1463.63 करोड़ हो गया। सन् 2004 से 2015 के बीच हुए 71 विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों को कुल 3368.06 करोड़ रुपए मिले। इसमें 63 फीसदी किस्सा कैश (नकदी) था। पिछले तीन लोकसभा चुनावों में भी 44 प्रतिशत दान नकदी में ही मिला। इन दिनों जबकि नोटबंदी के बाद कालेधन को सफेद करने के लिए टैक्स और जुर्माने का प्रावधान किया है सरकार ने। लेकिन राजनीतिक दलों के लिए टैक्स में छूट की व्यवस्था जारी रखकर केंद्र सरकार ने आम जनता और राजनीतिक दलों के बीच दोहरे रवैए का परिचय दिया है।

एक तरफ वह जनता के लिए रोज सख्त से सख्त नियम बना रही है, लेकिन देश की सियासी ताकतों से टकराने की हिम्मत नहीं दिखा रही है। जब सत्ता में बैठी शक्तियां ही पारदर्शिता नहीं अपनाएंगी तो फिर बाकी लोगों के खिलाफ कार्रवाई का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछले सप्ताह शुक्रवार को केंद्र सरकार ने साफ किया कि राजनीतिक दलों के खाते में 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों में जमा राशि पर आयकर नहीं लगेगा। लेकिन यह राशि 20 हजार रुपए से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और दस्तावेजों में दर्ज होनी चाहिए।

आम लोगों का भरोसा बनाए रखने का प्रयास
यहां यह बता दें कि आयकर कानून 1961 की धारा 13 ए के तहत राजनीतिक दलों को उनकी आय पर कर से छूट प्राप्त है। उनकी यह आय आवास संपत्ति, अन्य स्त्रोतों, पूंजीगत लाभ और किसी व्यक्ति की ओर से स्वैच्छिक योगदान से हो सकती है। दरअसल यह व्यवस्था काफी समय से चली आ रही है और इसकी आड़ में कालेधन को सफेद किया जाता है। कमोबेश सारे ही राजनीतिक दल जितनी चुनावी कमाई करते हैं, उसका सबसे बड़ा हिस्सा वे 20 हजार रुपए से कम के दान खाते में दिखाते हैं।

जब चुनाव आयोग उनसे विस्तृत हिसाब मांगता है तो वे आधी-अधूरी खानापूर्ति भर कर देते हैं। कालेधन को खपाने का यह खेल दूसरे तरीके से भी चल रहा है। इसी बात के मद्देनजर चुनाव आयोग ने चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए राजनीतिक दलों को मिलने वाले गुप्त चंदे की राशि 2 हजार रुपए तक सीमित किए जाने के लिए कानून में संशोधन किए जाने का केंद्र सरकार से अनुरोध किया है। एक ओर जहां चुनाव आयोग ने यह सुझाव दिया है, वही सरकार ने पिछले सप्ताह स्पष्ट किया था कि राजनीतिक दलों के खातों में 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट जमा कराने पर आयकर नहीं लगेगा।

ऐसी ही मजेदार खबरे पढने के लिए क्लिक करे Samachar Jagat पर

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s